सुप्रीम कोर्ट ने UGC के अनुसूचित जाति-जनजाति विरोधी नियमों पर रोक लगा दी, आम वर्ग के छात्रों के विरोध के बीच

सुप्रीम कोर्ट ने UGC के अनुसूचित जाति-जनजाति विरोधी नियमों पर रोक लगा दी, आम वर्ग के छात्रों के विरोध के बीच

सुप्रीम कोर्ट ने आज यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) के UGC के नियम 2026 पर तुरंत रोक लगा दी, जिसके तहत आम वर्ग के छात्रों और शिक्षकों के खिलाफ जाति-आधारित भेदभाव के आरोपों को अत्यधिक कठोर तरीके से सुना जाना था। यह नियम 13 जनवरी 2026 को जारी किए गए थे, लेकिन अब उनकी लागू होने की तारीख अनिश्चित हो गई है। कोर्ट की बेंच, जिसमें मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायाधीश जोयमल्य बागची शामिल हैं, ने कहा कि नियमों में 'भेदभाव' की परिभाषा इतनी अस्पष्ट है कि इसका दुरुपयोग हो सकता है। अस्थायी रूप से, UGC के 2012 के पुराने नियम लागू रहेंगे। अगली सुनवाई 19 मार्च 2026 को होगी।

क्यों उठा आम वर्ग का विरोध?

ये नियम तभी तक चले जब तक उनके खिलाफ आम वर्ग के छात्रों और शिक्षकों का विरोध शुरू नहीं हो गया। उत्तर प्रदेश के आगरा, बरेली, मेरठ, लखनऊ, बुलंदशहर और खुर्जा सहित दिल्ली, राजस्थान और बिहार में भीड़-भाड़ वाले विरोध प्रदर्शन हुए। बरेली के शहर न्यायाधीश अलंकार अग्निहोत्री ने इन नियमों के खिलाफ अपना पद छोड़ दिया, कहते हुए कि "ये नियम आम वर्ग के छात्रों को स्वयं से ही अपराधी बना देते हैं।"

विरोध का नेतृत्व विनीत जिंदल नाम के एक वकील ने किया, जिन्होंने एक जनहित याचिका (PIL) दायर की। उनका दावा है कि ये नियम अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के अलावा अन्य सभी वर्गों के लिए शिकायत दर्ज करने का अधिकार छीन रहे हैं। ये नियम, उनका तर्क है, संविधान की अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), 15(1) (जाति, धर्म, लिंग के आधार पर भेदभाव का निषेध) और 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के उल्लंघन हैं।

क्या है नियमों की समस्या?

सबसे बड़ी समस्या है UGC के नियमों का अनुच्छेद 3(C)। यह अनुच्छेद आम वर्ग के लोगों को उनकी बातचीत, टिप्पणी या व्यवहार के लिए जाति-आधारित भेदभाव के आरोप में दोषी ठहराने की अनुमति देता है — बिना किसी ठोस साक्ष्य के। यह वह बिंदु है जहां विरोधी लोग कहते हैं कि ये नियम न्याय के बजाय डर का निर्माण कर रहे हैं।

कोर्ट ने भी इसी बात पर जोर दिया: "अगर कोई छात्र अपने साथी को बुलाकर कहे कि 'तुम तो आम वर्ग हो, तुम्हारा व्यवहार अलग होना चाहिए', तो क्या यह भेदभाव है?" ये सवाल नियमों की अस्पष्टता को उजागर करता है। इसका जवाब नियमों में नहीं है।

प्रदर्शन, त्याग और राजनीति

विरोध केवल छात्रों तक सीमित नहीं था। बरेली और महोबा में हजारों लोगों ने जिला कलेक्टर कार्यालय के सामने याचिकाएं जमा कीं। बुलंदशहर के खुर्जा में भी एक बड़ी भीड़ ने एक याचिका जमा की, जिसमें भारत के राष्ट्रपति को संबोधित करते हुए नियमों को वापस लेने की मांग की गई।

भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने गंगा किनारे दीपक जलाकर विरोध का संकेत दिया। हिंदू संत-साधुओं ने भी इस आंदोलन में हिस्सा लिया। कुछ नेताओं ने कहा कि अगर सरकार ने नियमों को वापस नहीं लिया, तो आंदोलन और बढ़ेगा।

कांग्रेस के नेता आर्यन मिश्रा ने तो भाजपा के मुख्यालय और राज्यसभा सदस्य डॉ. दिनेश शर्मा, मंत्री दिनेश सिंह और उप मुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक के घरों पर विरोध पोस्टर लगा दिए। यह एक अनोखा राजनीतिक चलन था — एक दल का विरोध दूसरे दल के नेताओं के खिलाफ।

शिक्षा मंत्री की प्रतिक्रिया: अभी तक बस बयान

केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने बार-बार कहा कि नियमों का दुरुपयोग नहीं होगा। लेकिन जब न्यायाधीश ने कहा कि "हम देख रहे हैं कि ये नियम एक तरफा हैं, और जो भेदभाव हो रहा है, वह दोनों ओर से हो सकता है," तो उनके बयान बहुत कमजोर लगे।

एक शिक्षक संघ के नेता ने हमें बताया, "हमने अपने छात्रों को जाति के आधार पर अपमानित होते देखा है — चाहे वे SC/ST हों या आम वर्ग। लेकिन इन नियमों में एक तरफा न्याय है। ये नियम न्याय नहीं, भय बन गए हैं।"

अगला कदम: नियमों का पुनर्निर्माण

अब सरकार को नियमों को फिर से लिखना होगा — और इस बार बहुत सावधानी से। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि भेदभाव की परिभाषा में आम वर्ग के लोगों को भी शामिल किया जाना चाहिए। अगर नियमों में गलत आरोपों के खिलाफ सुरक्षा नहीं होगी, तो ये नियम न्याय के बजाय अन्याय बन जाएंगे।

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि अगर नियमों में एक अलग अधिकारिक निकाय बनाया जाए — जो आरोपों की जांच करे और झूठे मामलों को तुरंत रोके — तो ये नियम जनसमर्थन पा सकते हैं। लेकिन अभी तक, ये नियम एक विवाद के रूप में बने हुए हैं।

सोशल मीडिया पर आंदोलन

#UGCRollback हैशटैग अब ट्रेंडिंग है। युवा छात्र अपने वीडियो में कह रहे हैं: "हम भेदभाव के खिलाफ नहीं, बल्कि एक तरफा न्याय के खिलाफ हैं।" ट्विटर और इंस्टाग्राम पर छात्र अपने अनुभव साझा कर रहे हैं — कुछ ने कहा कि उन्हें अपने दोस्तों से बात करने से डर लगता है, क्योंकि कोई भी बात भेदभाव का आरोप बन सकती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

UGC के नियम 2026 क्यों रोक दिए गए?

सुप्रीम कोर्ट ने नियमों की भेदभाव की परिभाषा को अस्पष्ट और एक तरफा बताते हुए रोक लगा दी। कोर्ट का कहना है कि ये नियम आम वर्ग के छात्रों के खिलाफ झूठे आरोपों का रास्ता खोल सकते हैं, और इनमें उनके लिए कोई सुरक्षा नहीं है। अनुच्छेद 3(C) को विशेष रूप से चुनौती दी गई है।

आम वर्ग के छात्रों को क्या खतरा है?

नियमों के तहत, कोई भी बातचीत, मजाक या व्यवहार भेदभाव का आरोप बन सकता है। एक छात्र जो किसी अनुसूचित जाति के दोस्त से कहे कि "तुम तो अलग हो," उसे भी जांच के लिए लाया जा सकता है। इससे शिक्षा में डर फैल रहा है।

2012 के नियम क्या हैं और वे अभी भी लागू हैं?

हाँ, 2012 के UGC नियम अभी भी लागू हैं। इनमें भेदभाव के खिलाफ जांच की प्रक्रिया थी, लेकिन इनमें आरोपों के लिए विस्तृत साक्ष्य की आवश्यकता थी। नए नियम इसे बहुत आसान बना रहे थे — इसलिए कोर्ट ने उन्हें रोक दिया।

क्या ये नियम जाति-आधारित भेदभाव को रोकने के लिए बनाए गए थे?

हाँ, ये नियम जाति-आधारित भेदभाव को रोकने के लिए बनाए गए थे — लेकिन उनका तरीका विवादास्पद था। अनुसूचित जाति और जनजाति के छात्रों के खिलाफ भेदभाव वास्तविक है, लेकिन आम वर्ग के छात्रों के खिलाफ भी भेदभाव होता है। नियमों में दोनों ओर का संतुलन नहीं था।

अगली सुनवाई कब होगी और क्या अपेक्षा है?

अगली सुनवाई 19 मार्च 2026 को होगी। अपेक्षा है कि सरकार एक संशोधित नियम प्रस्तुत करेगी, जिसमें आरोपों की जांच के लिए एक स्वतंत्र बोर्ड बनाया गया हो, और आम वर्ग के लोगों के लिए भी सुरक्षा का प्रावधान हो।

क्या ये नियम भारत के लिए एक बड़ा मोड़ हैं?

हाँ। यह पहली बार है जब एक शिक्षा नियम इतने व्यापक विरोध का शिकार बना है। यह दर्शाता है कि भारत में जाति के मुद्दे अभी भी गहरे हैं — और नियम बनाने का तरीका भी बदलना होगा। अब न्याय का मतलब सिर्फ एक वर्ग की सुरक्षा नहीं, बल्कि सभी के लिए न्याय होना चाहिए।

3 Comments

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    Senthil Kumar

    जनवरी 30, 2026 AT 13:09

    ye toh badi baat hai, ab toh har koi apne aap ko victim samajhne laga hai

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    Ayushi Kaushik

    फ़रवरी 1, 2026 AT 02:24

    अगर किसी ने मुझे कहा कि 'तुम तो आम वर्ग हो, तुम्हारा व्यवहार अलग होना चाहिए' - तो वो बात भी तो एक तरह का भेदभाव है, न? अब तो सबको एक समान रूप से सम्मान मिलना चाहिए, न कि किसी एक वर्ग के लिए खास नियम। ❤️

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    Harsh Gujarathi

    फ़रवरी 2, 2026 AT 23:17

    अच्छा हुआ कि कोर्ट ने रोक लगा दी! अब तो लोगों को बात करने में डर नहीं लगेगा। बस एक दूसरे के साथ इंसानियत से व्यवहार करें, बस यही काफी है 😊

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